जब एक भक्त ने वरदान में मांगी भगवान शिव से उनकी प्रिय वस्तु…पढ़ें ये रोचक कथा

वृन्दावन में विराज रहे श्री राधावल्लभ लाल की सुंदरता देखते ही बनती है. वल्लभ जी का लम्बा कद, तिरछी कमर, मदहोश करने वाले नेत्र, लम्बी वेणी, उनकी मनोहर विग्रह गुणगान करने के लिए शब्द कम हैं. माना जाता है की राधावल्लभ जी का आधा स्वरूप श्री कृष्ण का है और आधा राधा रानी का. तो आइए जानते हैं, कैसे हुआ मनमोहन श्री राधावल्लभ लाल जी का प्राकट्य.

 

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आत्मदेव को शिव जी का वरदान
आत्मदेव नामक एक ब्राह्मण थे, जो कि भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे. आत्म्देव जी के पूर्वज भी शिव भक्ति में ही लीन रहे. एक बार आत्मदेव की तपस्या और अपने प्रति प्रेम देखकर भगवान शिव अत्यधिक प्रसन्न हुए और उनके सम्मुख प्रकट होकर, एक मनचाहा वरदान मांगने को कहा. इसपर आत्मदेव जी बोले, “हे नाथ! जीवन भर बस आपके दर्शन की ही लालसा थी, जो कि आज आपकी कृपा से पूर्ण हो गई. इसके अतिरिक्त भक्त को कुछ और नहीं चाहिए प्रभु.”

यह सुन भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हो गए और पुनः उनसे कुछ मांगने को कहा. इस पर आत्मदेव ने भगवान शिव से उनकी सबसे प्रिय वस्तु देने को कहा. अब भगवान शिव ने सोचा की उनकी सबसे प्रिय वस्तु तो राधावल्लभ लाल जी का विग्रह है, जिसकी सेवा बाबा भोले खुद एवं मां पार्वती भी करती हैं. बाबा वह देना तो नहीं चाहते थे परंतु अब वचन पूरा करने के लिए देना पड़ा.

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हरिवंश जी और आत्मदेव की दोनों पुत्रियों का विवाह
उधर ब्रज के एक बड़े निकुंज उपासना के संत श्री हित हरिवंश प्रभु के स्वप्न में राधा रानी ने आकर उन्हें आत्म्देव की पुत्रियों से विवाह करने को कहा. वैसे तो हरिवंश जी विरक्त रहना चाहते थे परंतु राधा रानी के आदेश वश उनका विवाह आत्मदेव जी की दोनों पुत्रियों का विवाह हरिवंश जी के साथ हुआ और साथ ही उन्हें प्राप्त हुआ श्री राधावल्लभ लाल जी का विग्रह.

इसके बाद हरिवंश जी पुनः वृन्दावन पधारे और उन्होंने मंदिर में वल्लभ जी को विराजमान कराया. आज भी हरिवंश महाप्रभु जी के वंशज वल्लभ जी की सेवा में लगे हैं और राधावल्लभ जी के मंदिर में अष्टयाम की सेवा होती है एवं वहां सखी भाव की उपासना है.

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